राज्यों को अतिरिक्त बिक्री कर, सरचार्ज लगाने का अधिकार बरकरार- सुप्रीम कोर्ट
-आज समाचार सेवा-
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के अतिरिक्त बिक्री कर, सरचार्ज और सेस लगाने के अधिकार को बरकरार रखा है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय संविधान पीठ ने बुधवार को 27 साल पुराने संवैधानिक विवाद पर फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि अतिरिक्त कर की गणना मूल बिक्री कर की देय राशि के प्रतिशत के आधार पर की जाती है तो उसका स्वरूप भी बिक्री कर का ही माना जाएगा। ऐसे कर राज्य सूची की प्रविष्टि-54 के तहत राज्यों की विधायी शक्तियों के दायरे में आते हैं।
पीठ में जस्टिस के.वी. विश्वनाथन, एस.वी.एन. भट्टी, जॉयमाल्य बागची, एन.वी. अंजारिया, अरुण पल्ली और वी. मोहन शामिल थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कर का नाम अतिरिक्त कर, सरचार्ज या सेस रख देने मात्र से उसकी संवैधानिक प्रकृति नहीं बदल जाती। उसकी वैधता का निर्धारण उसके वास्तविक स्वरूप और आधार से होगा।
यह विवाद ओडिशा सेल्स टैक्स एक्ट, 1947 की धारा 5ए से जुड़ा था। इसके तहत 10 लाख रुपये से एक करोड़ रुपये तक वार्षिक कारोबार करने वाले व्यापारियों पर 10 प्रतिशत और एक करोड़ रुपये से अधिक कारोबार वालों पर 15 प्रतिशत अतिरिक्त बिक्री कर लगाया गया था। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि राज्यों को बिक्री और खरीद पर कर लगाने का अधिकार है, लेकिन अतिरिक्त बिक्री कर वस्तुतः आयकर की प्रकृति का है, जिसे लगाने का अधिकार केवल संसद के पास है।
इस मामले को वर्ष 1999 में सात जजों की संविधान पीठ के पास भेजा गया था। अदालत ने एस. कोदार मामले में दिए गए फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि अतिरिक्त बिक्री कर लगाने से मूल कर का चरित्र नहीं बदलता। हालांकि, पीठ ने कहा कि विवादित कानूनों की जगह नए कानून लागू हो चुके हैं, इसलिए मूल संदर्भ में उठाया गया सवाल अब काफी हद तक अकादमिक रह गया है।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी थी कि 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद इस तरह के अधिकांश विवाद अप्रासंगिक हो गए हैं। अदालत ने भी पुराने फैसलों की कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि एस. कोदार मामले में निर्धारित सिद्धांत अब भी प्रभावी है।
=======
दो से अधिक बच्चों पर चुनावी पाबंदी की प्रासंगिकता खत्म- सुप्रीम कोर्ट
-आज समाचार सेवा-
नयी दिल्ली, 4 नवम्बर। सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए दो से अधिक बच्चे होने पर उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया है। अदालत ने कहा कि देश में घटती प्रजनन दर और बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति को देखते हुए ऐसे कानूनों पर फिर से विचार करने की जरूरत है।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि वर्ष 2003 में भारत की कुल प्रजनन दर तीन थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। यह 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से भी कम है। ऐसे में जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाए गए इन कानूनों का औचित्य अब समाप्त होता दिखाई दे रहा है। अदालत ने आगाह किया कि घटती प्रजनन दर के कारण भविष्य में आबादी में बुजुर्गों की हिस्सेदारी बढ़ने और कामकाजी आयु वर्ग की आबादी कम होने की चुनौती सामने आ सकती है।
पीठ ने 2003 के 'जावेद बनाम हरियाणा राज्य' मामले में दिए गए फैसले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया है। उस फैसले में तीन से अधिक नहीं, बल्कि दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने वाले हरियाणा पंचायती राज अधिनियम के प्रावधान को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया गया था।
अदालत ने कहा कि ऐसे प्रतिबंधों के कारण नागरिकों का एक पूरा वर्ग राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित हो सकता है, जबकि बच्चों की संख्या का किसी व्यक्ति की सार्वजनिक पद संभालने की क्षमता से सीधा संबंध नहीं है।
इसी मामले में पीठ ने महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 के तहत तीसरे बच्चे के जन्म के कारण काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव को अयोग्य ठहराने का फैसला भी रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों में दो बच्चों की अनिवार्यता वाले कानूनों की नए सिरे से समीक्षा जरूरी है।
--
संबंधित समाचार
टिप्पणियाँ (0)
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है।