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पूर्व राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, मुख्य मंत्रियोंको आवास देनेपर केन्द्रसे जवाब-तलब

नयी दिल्ली (आससे) । उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्यों की सरकारों से पूछा है कि क्या उनके द्वारा पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगला आवंटित किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने इस बारे में केंद्र और राज्यों से विचार मांगा है।  उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी बंगला आवंटित किये जाने के प्रावधान पर सुनवाई करते हुये उच्चतम न्यायालय ने उक्त बातें कहीं। न्यायमित्र गोपाल सुब्रह्मणियम ने कहा था कि पूर्व प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी बंगला नहीं दिया जाना चाहिये, क्योंकि यह जनता के पैसे का दुरूपयोग है। मामले की अगली सुनवाई १३ मार्च को होगी। बता दें कि पिछली सुनवाई में शीर्ष अदालत ने कहा था कि वह इस मामले में विस्तृत सुनवाई करेगी। अदालत ने इसे जनहित का मामला बताते हुये वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मणियम को न्यायमित्र नियुक्त किया था। उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि मामला जनहित से जुड़ा है, लिहाजा विस्तृत तरीके से इसका परीक्षण जरूरी है। पीठ ने कहा कि इसका असर विभिन्न राज्यों पर ही नहीं बल्कि केंद्रीय कानून पर भी पड़ेगा। मालूम हो कि एक गैर सरकारी संगठन की तरफ से दाखिल की गयी याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी आवास दिये जाने के प्रावधान को अगस्त २०१५ में उच्चतम न्यायालय ने निरस्त कर दिया था और दो महीने के भीतर सभी मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास खाली करने का आदेश दिया था। शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री आवास आवंटन नियम १९९७ को गैर कानून करार देते हुये लाभ पाने वाले सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों से किराया भी वसूलने का आदेश दिया था। हालांकि राज्य सरकार ने प्रावधान में सशोधन और नया कानून लाकर इस फैसले को निष्प्रभावी कर दिया था। याचिका में इस संशोधन प्रावधान और नये कानून को चुनौती दी गयी है।
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आधार मामलेमें सभी पक्षोंका समय निर्धारित करे सुप्रीम कोर्ट-केंद्र
नयी दिल्ली। आधार की अनिवार्यता से जुड़े मामले में सरकार की तरफ से उच्चतम न्यायालय में कहा गया है कि फरवरी की शुरुआत से ही अयोध्या मामले की सुनवाई होनी है, लिहाज आधार मामले में सभी पक्षों का वक्त निर्धारित किया जाय।  आधार की अनिवार्यता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान एटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने पीठ से कहा कि फरवरी की शुरुआत से ही अयोध्या मामले की सुनवाई होनी है, इसलिये सभी पक्षों का समय निर्धारित किया जाय।  एटार्नी जनरल की इस दलील पर याचिकाकत्र्ता की ओर से पेश हुये वकील ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि अगले हफ्ते ही बता सकते हैं कि उनकी बहस में कितनावक्त लगेगा, क्योंकि इस मामले में अलग-अलग पहलुओं पर २७ याचिकाएं दाखिल की गयी हैं। वकील ने पीठ से कहा कि यह मामला बेहद गंभीर है और इसमें समूची आधार परियोजना को चुनौती दी गयी है। कोई भी लोकतांत्रिक समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा कि विदेशों में फैसला नागरिकों के पक्ष में गया है। अगर सरकारी योजना को मंजूरी दी जाती है तो ये नागरिकों का संविधान ही नहीं बल्कि राज्य के संविधान जैसा होगा। अपनी दलील में अधिवक्ता ने यह भी कहा कि पीठ को यह भी तय करना है कि आधार कार्ड संवैधानिक है या नहीं और क्या यह कानून के नियमों के मुताबिक है। सवाल यह भी है कि आधार कार्ड को मनी बिल की तरह क्यों पेश किया गया। क्या लोकतंत्र में किसी को ये अधिकार है कि नहीं कि वो पहचान पत्र के लिये फिंगर प्रिंट या शरीर के किसी हिस्से का निशान दे या नहीं।