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३६ के आंकड़ेमें बदली ३६ महीनेकी दोस्ती

नयी दिल्ली (एजेंसी)। आखिरकार जम्मू कश्मीर में बीजेपी और पीडीपी की दोस्ती टूट गई।  विधानसभा चुनाव के बाद जब बीजेपी ने पीडीपी को समर्थन देकर सरकार में शामिल होने का फैसला लिया था तो हर कोई हैरान था।  वजह साफ थी कि दोनों पार्टियों की विचारधारा एक दूसरे से रत्ती भर भी मेल नहीं खाती थी। पीडीपी पर जहां अलगाववादी समर्थक होने के आरोप थे वहीं बीजेपी पर मुस्लिम या कश्मीर विरोधी होने का लेवल चस्ंपा हुआ था, लेकिन इसके बावजूद जब दोनों ने सरकार बनाई तो निश्चित तौर पर यह उस वक्त का सबसे बड़ा अजूबा था। पहले ही दिन से लोग कहने शुरू हो गए थे कि यह सरकार लम्बी नहीं चलेगी।  और आज वही हुआ। बीजेपी ने रमजान सीजफायर समाप्त होते ही पीडीपी से समर्थन वापस ले लिया।  इसके साथ ही महबूबा मुफ्ती सरकार का पतन हो गया और अब जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन का रास्ता साफ है।  फिलवक्त ऐसा कोई भी समीकरण सामने नहीं है कि  फिर से वहां बिना चुनाव सरकार बने। बात अगर जम्मू कश्मीर की दलीय स्थिति की करें तो इस समय पीडीपी के 28 और बीजेपी के 25 विधायक हैं।  नेशनल कांफ्रेंस के पास 15  और कांग्रेस के पास 12 विधायक हैं। समूचे विपक्ष को जोड़कर 34 एमएलए बनते हैं जबकि सत्ता पक्ष के पास 53 थे। कुल 87 सीटें हैं और दो महिलाएं नामित एमएलए हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 44 एमएलए चाहिए होते हैं। अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर बीजेपी ने यह फैसला क्यों लिया? माना जा रहा है कि घाटी के हालात लगातार बिगड़ते देख बीजेपी ने यह फैसला लिया है। बीजेपी कश्मीर के हालात को लेकर  विपक्ष के निशाने पर थी और देश के आम जनमानस में भी यह अवधारणा बन रही थी  कि  घाटी की हिंसा संभालने में बीजेपी कामयाब नहीं हो रही। दूसरी तरफ बीजेपी को भी लगने लगा था कि सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदम के बाद घाटी के ताज़ा हालात उसके लिए नुकसानदेह हो सकते हैं। यही वजह रही कि बीजेपी ने सरकार से किनाराकशी कर ली। सूत्रों की मानें तो रमजान सीजफायर की घोषणा के फैसले के दौरान ही यह फैसला ले लिया गया था कि अगर हालात नहीं सुधरे तो सरकार से बाहर का रास्ता अपना लिया जायेगा।  रमजान के दौरान सेना की बंदूकें तो खामोश रहीं लेकिन आतंकियों को सर उठाने का मौका मिल गया। पूरे महीने में सौ से अधिक आतंकी हमले हुए जिनमे से 26 ग्रेनेड हमले भी थे। करीब 46 लोगों की इस दौरान मौत हुई, लेकिन मामला तब बिगड़ा जब ईद के दिन राइजिंग कश्मीर नामक अखबार के संपादक शुजात बुखारी की सरेआम हत्या कर दी गई। शुजात को भारत सरकार का समर्थक माना जाता है और वे केंद्र की राह कश्मीर में शांति बहाली के समर्थक थे। उनके सगे भाई महबूबा मंत्रिमंडल में मंत्री भी थे। शुजात की हत्या के लिए लश्कर को जिम्मेवार माना जा रहा है। बीजेपी ने भले ही हिंसा को समर्थन वापसी का सबब बताया है लेकिन एक दूसरी चर्चा भी है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह बीजेपी का सोचा समझा मूव है।  बीजेपी लोकसभा के साथ जम्मू-कश्मीर में भी चुनाव कराना चाहती है। इसलिए उसने  समय का ध्यान रखकर ही यह फैसला लिया। वैसे अब चर्चा यह भी चल निकली है कि ऐसा ही दांव बीजेपी मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी चल सकती है। वहां विधानसभाएं भंग कराकर इसे अंजाम दिया जा सकता है। बीजेपी के आंतरिक सर्वे के मुताबिक मोदी अभी भी लोकसभा के लिए टॉप चॉइस हैं।  ऐसे में बीजेपी मोदी की किश्ती में  कुछ राज्यों की सरकारें भी समेटकर ले जाने की फिराक में है।  
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भाजपाने क्यों तोड़ी महबूबासे दोस्ती
नयी दिल्ली(एजेंसी)। भाजपा महासचिव राम माधव ने संवाददाता सम्मेलन में आज बड़ी घोषणा करते हुए कहा कि उनकी पार्टी जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन से बाहर हो गई है और राज्य में राज्यपाल शासन का समर्थन किया है। माधव ने कहा कि राज्य में गठबंधन सरकार में बने रहना भाजपा के लिए मुनासिब  नहीं रह गया था। भाजपा ने गिनाए ये कारण
० जम्मू-कश्मीर में शांति बहाली के लिए महबूबा मुफ्ती को राज्य की कमान सौंपी गई थी लेकिन वे हालात नहीं संभाल पाईं।
० राज्य के तीन क्षेत्रों-जम्मू, लद्दाख और कश्मीर क्षेत्र के समान विकास के लिए केंद्र ने कोशिश की। पर महबूबा सरकार द्वारा जम्मू क्षेत्र के साथ भेदभाव किया गया।
० राज्य में एक बड़े पत्रकार की हत्या हो गई पर राज्य सरकार चुप रही।
० राज्य में आतंकवादी गतिविधियां काफी बढ़ गई थीं। घाटी में स्थिति खराब हो गई है।
० महबूबा ने भाजपा और केंद्र सरकार के काम में अड़ंगा डालने की कोशिश की।
० घाटी में प्रेस की आजादी भी खतरे में।
० रमजान के दौरान केंद्र सरकार ने शांति बहाल के लिए राज्य में सीजफायर किया था। पर इसमें भी मतभेद थे।
० महबूबा मुफ्ती भाजपा नेताओं के साथ तालमेल नहीं बना पाई।
० सीमा पार से भी फायरिंग में इजाफा हुआ।
० केंद्र महबूबा सरकार के फैसलों और उसके कामकाज से खुश नहीं थी।

माधव ने पत्रकारों से कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है, इस बात को ध्यान में रखते हुए और राज्य में मौजूदा स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए हमने फैसला किया कि राज्य में शासन की बागडोर राज्यपाल को सौंपी जाए।ÓÓ भाजपा नेता ने कहा कि राज्य में पीडीपी गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही थी लेकिन वह स्थिति को नियंत्रित करने में नाकाम रही।