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मूर्ति पूजन

मूर्तिको देख कर श्रद्धाकी भावना भीतरसे जाग्रत होती है। दूसरा कारण यह है कि जब बौद्धों एवं जैनियोंने अपने मंदिर बनवाये तो उन्होंने इतनी सुन्दर प्रतिमाएं रखीं कि सनातन धर्मको माननेवालोंको भी लगा कि उन्हें भी ऐसा ही कुछ करना चाहिए। इसलिए उन्होंने भी इसका अनुसरण किया और भगवान विष्णु, भगवान राम और भगवान कृष्णकी विभिन्न मूर्तियां स्थापित करनी शुरू कर दीं। आपको भगवद्गीता या रामायणमें पूजाके लिए मूर्तियां लगानेकी प्रथाका वर्णन कहीं नहीं मिलेगा। केवल शिवलिंग ही रखा जाता था। इसीलिए प्राचीन कालमें केवल शिवलिंग ही था, जिसकी भगवान राम, भगवान कृष्ण एवं बाकी सब पूजा करते थे। पैगंबर मोहम्मदके आनेसे बहुत पहलेसे ही लोग तीर्थ यात्राके लिए मक्का जाते थे। इसीलिए तीर्थयात्री वहां जाते हैं और वहां रखे पत्थर (सलीब) को चूमते हैं और इसकी सात बार परिक्रमा करते हैं। यह बिलकुल शिव मंदिरोंकी तरह किया जाता है। यह प्राचीन कालसे चली आ रही परम्पराओंके बिलकुल अनुरूप है। इस तरहसे गया और मक्कामें की जानेवाली पूजामें अद्भुत समानता है। एक ही प्रकारका पत्थर रखा गया है और इसे ही पूजा जाता है, एक ही तरहसे परिक्रमाएं ली जाती हैं। ३५०० ईसा पूर्वसे २८०० ईसा पूर्वका समय भारतीय इतिहासमें वैदिक कालके रूपमें जाना जाता है और २८०० ईसा पूर्वसे २६०० ईसा पूर्वतकके समयको रामायणका युग कहा गया है। इस सारे समयमें भगवान शिवकी पूजाका कोई प्रमाण या उल्लेख नहीं है। गुरुदेव, हमने चार महान युगों, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुगके विषयमें पढ़ा है, जबकि स्कूल एवं कालेजमें पढ़ाया जानेवाला इतिहास युगोंके विभाजनकी इस प्रणालीको नहीं मानता और इसे पूर्णत: नकारता है। यह कहा जाता है कि आर्य जातिका भारतमें आगमन लगभग ५५०० वर्ष पूर्व हुआ था। हम इस विसंगतिको कैसे समझें। आर्य लोगोंके आगमनकी धारणा, जिसे पढ़ाया जा रहा है, गलत सिद्ध हुई है। विश्वकी आयु २८ बिलियन या १९ बिलियन  वर्ष बतायी गयी है, जो कि बिलकुल उससे मेल खाता है जैसा कि हमारे पंचागमें बताया गया है। इतिहासकी पुस्तकें लिखते समय सब कुछ ६००० वर्ष पूर्वके बाद हुआ बताया गया है। उसके जैसे विद्वानोंने न तो संस्कृत पढ़ी है और न ही हमारे प्राचीन अभिलेखोंको। गुरुजी उन चीजोंको कैसे जाने जो हमारे लिए अज्ञात है। ऐसी बहुत-सी चीजें हैं, जिन्हें कि हम नहीं जानते। मैं आपकी परेशानीको समझता हूं। कुछ जाननेकी चाह की तीव्र पिपासा है, परन्तु वह कुछ क्या है, यह आप नहीं जानते। आप जानते हैं कि कुछ है, परन्तु आप नहीं जानते कि उस कुछको कैसे जाने। ऐसा ही है नये बस शांत हो जाइये और ध्यान कीजिए। यही वहां पहुंचनेका मार्ग है।
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लोक संवाद
सबका मालिक एक
महोदय,- आर या पार। यह नारा और जोश है उन जवानोंमें जो देशकी रक्षा करनेकी खातिर सीमापर डटे हुए हैं। यही नारा सीमांत गांवोंके लोग भी लगा रहे हैं। 'पाकिस्तान क्या समझता है अपने आपको। इस बार तो हम दुनियाके नक्शेसे ही उसका नामोनिशान मिटा देंगे।‘ इसके अलावा यह लक्ष्य भी है उन सैनिकोंका जो सीमा पार बड़े पाकिस्तानी सेनाके जमावड़ेके पश्चात सीमापर तैनात किये गये हैं। जम्मू फ्रंटियरकी अंतरराष्ट्रीय सीमाकी इस चौकीपर एक-दूसरेको ललकारनेका कार्य भी जारी है। पाकिस्तानी सीमा चौकीकी दूरी मात्र १५० गज। जिस स्थानपर यह संवाददाता खड़ा था उससे जीरो लाइन, अर्थात् दोनों देशोंको बांटनेवाली रेखाकी दूरी थी मात्र ७५ गज। चिल्लाया न जाय तो भी उस आवाजको दुश्मनके सैनिक सुन लेते हैं। अब बहुत हो गया। इस बार तो हमें आर-पारकी लड़ाई लडऩी होगी। यदि हम ऐसे ही हिम्मत हारते गये गये जवानोंका जोश ठंडा पड़ जायगा। यही कारण है कि ऊपरके आदेशोंके बाद भी हम संयमको कभी-कभी तोड़ देते हैं। चौकीपर तैनात अधिकारीने कहा था। वह अपनी पहचान गुप्त रखना चाहता था। ऐसी भावनाके पीछेके ठोस कारण भी हैं। पाकिस्तानकी उकसावेवाली गतिविधियां, सीमा पार तैनात जवानोंकी संख्यामें वृद्धि, बख्तरबंद वाहनों, टैंकोंके जमावड़ेने परिस्थितियोंको भयानक बनाया है। इतना भयानककी युद्धका साया सारी सीमापर मंडराने लगा है। हालांकि इस सायेके तले नागरिक भी आ गये हैं जो सुरक्षित स्थानोंपर जान बचानेकी दौड़ लगाना शुरू कर दिये हैं। आखिर वह दौड़ लगाये भी क्यों न। घरोंके भीतर वह बैठ नहीं सकते। बरामदेमें खड़े नहीं हो सकते खेतोंमें जा नहीं सकते क्योंकि वह जानते हैं कि गोलियोंकी बरसात उन्हें मजबूर कर देगी कि वह अपने उन घरों और गलियोंका त्याग कर दें जहां उन्होंने बचपन गुजारा है। परन्तु सैनिकोंके लिए ऐसा नहीं है। बंकरों और खंदकोंकी आड़में वह पाकिस्तानी गोलियोंका जवाब गोलियोंसे देनेके लिए पूरी तरह तैयार हैं। अक्सर पाकिस्तानी सेना अंतरराष्ट्रीय सीमाकी शांतिको मोर्टारके गोलोंके धमाकोंसे भी भंग करती है। परन्तु भारतीय पक्ष मोर्टारका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय सीमापर नहीं करता। आखिर क्यों भारतीय सेना मोर्टारका जवाब मोर्टारसे नहीं देती, चपरालके जगतार सिंहने कहा था। बराबरका जवाब न दे पानेका अफसोस सैनिकोंको भी है। यदि दुश्मन एक थप्पड़ मारता है तो हमें उसके बदले चार मारनेकी इजाजत होनी चाहिए। यही तरीका है शत्रुका हौसला तोडऩे और अपने जवानोंका मनोबल बढ़ानेका। बंकरके पीछे एमएमजीको संभालनेवाले जवानने असंतोष भरे शब्दोंमें कहा था। सचाई यह थी कि पाकिस्तानी सैनिक रेंजरोंका स्थान ले रहे हैं और वह उकसानेवाली काररवाईके तहत भारतीय सैनिक तथा असैनिक ठिकानोंपर मोर्टार दाग रहे हैं। यह बात अलग है कि भारतीय पक्ष इस उकसावेमें नहीं आता। परंतु मनोबलमें कमी आती है इतना जरूर है। -सुरेश डुग्गर, जम्मू।